मालवा में रमक झमक :गणगौर रनु बाई
सोमवार, 14 मई 2012
रविवार, 25 मार्च 2012
मालवा में रमक झमक :गणगौर रनु बाई
मालवा में रमक झमक :गणगौर रनु बाई
मालवा में गणगौर को तेवार सदियों पेला से मनायो जाय हे | हर जुग में कुवारी छोरी होन और जिनका नवा नवा ब्याव हुआ हे ने सगळी शादी शुदा महिलाओ को गहरो सम्बन्ध इणा तेवार जुड्यो हुवो हे |इके एक सांस्क्रतिक उत्सव की तरे से भी मनायो जावे हे |ब्याहता जिंदगी में मजबूती ने पति की लंबी आयु सारु इना तेवार को बडो महत्व हे | गणगौर को सब्द अंतहीन पवित्र ब्याहता जिंदगी की खुश्हाली से जुड्यो हुवो हे |कुवारी छोरी होन अछो पति पाने सारु ने जीको ब्याहता होन पति की लंबी आयु सारु यो तेवार घनी खुशी ने मस्ती से मानावे हे |बरत रखे ने सजी धजी के सिंगार करी के गहना पेरी के रमक झमक करती मालवा की ब्याहता ने कुवारी छोरी होन पूजा की शुरुवात करे |यो तेवार रिश्ता को मान हे
ने बाई बेन होन सबसे प्रिय तेवार हे |
मालवा में गणगौर को तेवार होली का दूसरा दन से शुरू होय ने पूरा १८ दन तक लगातार चले हे |चेत्र कृष्ण पड़वा से रोजाना बाई बेन होन ना गणगौर की पूजा करे हे |फिर चेत्र शुक्ल दूज (सिंजारा ) का दन नदी ,तलाव पे जय के पूजी हुई गणगौर के पानी पावे ने दूसरा दन सांजे उनको विसर्जन करी दे | १८ दन तक चलने वाला इणा तेवार पे बाई बेन ना होली की राखोड़ी से १६ पिंडी बनाई के पातला में स्थापित करे हे ने उनका अगाडी पछड़ी जवारा बोवे हे | शंकर ने पारवती कि स्थापना करी के उनकी पूजा करी जावे हे | सांजे बिंद बिन्द्णी बनी के बाग बगीचा में ,मोहल्ला में ,रंग बिराना कपडा पेरी के बाई बेन होन घूमने निकले ने मस्ती करे ,नाचे गावे हे ,आरतिय और भजन गावे हे ,और खुशी को अनुभव करे हे |पानी ,रोली,मोली ,काजल ,मेहँदी,बिंदी,फुल,पत्ते,दूध ,हाथ में लिके बाई बेन ना कामना करे के हम भई के लड्डू दा ने भई हमारे चुनरी देगा ने हम गोरी (पारवती) को चुनरी देंगे और गोरी हमको मन माफिक सोभाग्य देगा |
मालवा फूल पाती की रस्म भी भोत ज मजेदार हे इमे दो बाई बेन ना पति पत्नी को सिंगार करी के जुलुस निकाले हे | बाई बेन होन के पुरुष का कपडा पेरने में घनों मजो आवे |
मालवा में नाचनो गानों इना तेवार को खास पहलु हे | घर होन में नाच गानों चलतो ज रेवे हे |” थारा कई कई रूप बखानू रनु बाई ,चोसठ देश से आई हो” जदे गावे तो ढोलक की थाप पे बाई बेन होन का पाव अपना आप उठी जावे | “सोनी गड को खडको म्हे सुन्यो सोना घड़े रे सुनार “ “रनु रणु बाई रथ सिंगारियो तो .”........ म्हारा दादाजी के जी मांडी गणगौर म्हारा काकाजी के मांडी गणगौर रसीया घडी दोय खेलवाने जावादो”..........गाढ़ो जोती न रणु बाई आया, यो गोडो कुण छोड़ोवे........हाँजी म्हारे आँगन कुओ खिनयदो हिवड़ा इतरो पानी....हाँजी जुड़ो खोलर न्हावा बेठी ईश्वरजी री रानी......शुक्र को तारो रे ईश्वर उंगी रह्यो ,कि तेकी मख टिकी घड़ाव || गौर गौर गणपति, ईसर पूजे पार्वती,पार्वती के आला टिका, गौर के सोने का टिका,...एक और गीत हे .....खेलण दो गणगौर,भँवर म्हाने खेलण दो गणगौर,जो म्हारो सैयों जो है बाट,माथे न मैमद लाब,म्हारी रखड़ी रतनजड़ी,भँवर म्हाने खेलण दो गणगौर.......... इ गीत में जीवन की सीख होय हे के बाई बन होन के जीवन में कैसे व्यवहार कारणों चिए |
मालवा से परदेश गया हुवा लोग भी इणा तेवार पे घरे आई जावे हे | जो नि आवे उनको रास्तो देखते बाई बेन होन की आखा णी थाके | कई भी हुई जावे गणगौर की राते तो वी आई ज जावे एसो वी सोचे हे | झुंझलाहट ,प्रतिछा ,खुशी ,दुःख सब के केने सारु बाई बेन होन कने एकाज साधन हे गीत गानों | इ गीत उनकी मानसिक दशा को एक आयनों हे | गणगौर में एक और रिवाज हे के बाई बेन होन अपना पति को नाम दोहा को रूप में लेवे हे |
पिछला साल संस्कृति मन्त्री ने ७ अप्रैल २०११ के घोषणा करी थी के अगला साल से गणगौर उत्सव को आयोजन संस्कृति विभाग करेगो पण अभी तक कई हल चाल दिखी नि री हे |
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